आज हम वर्ष कुंडली में लता योग के बारे में बात करेंगे ये योग कैसे बनता है! >यदि वर्ष कुंडली में दूसरे,छठे,और सातवें भाव में क्रूर ग्रह हों और लग्न का स्वामी दूसरे या बाहरवें भाव में हो तथा ये ग्रह शुभग्रहों से दृष्ट न हो या शुभग्रहों के साथ न हों,तो लता योग बनता है! >लत्ता योग का फल >जिस वर्ष यह योग बनता है,वह वर्ष जातक के लिए अत्यंत ही दुःखदायी और दुर्घटनाग्रस्त होता है!उस वर्ष शत्रुओं से वाद विवाद,मुकदमो में पराजय,मानसिक चिंताए तथा शत्रु चिंता बराबर बानी रहती है! Astrolivepawan.blogspot.com ,Pawankhandal39@gmail.com Ph.9462525905,8952825905
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सर्वप्रथम तो आपको बता देता हूं कि मेरे द्वारा लिखी गयी पोस्ट शुभ कर्म को ही निर्देश करती हैं।(शान्तिकर्म) तंत्र शास्त्र में षट्कर्म प्रक्रियाओं द्वारा अनुष्ठान किये जाते हैं। विद्वानों ने शान्ति,वशीकरण,स्तम्भ,विद्वेषण,उच्चाटन,और मारण,इन छःप्रकार की प्रक्रियाओं को षट्कर्म बताया है।। शुभकर्म के अन्तर्गत पोस्ट ही साझा करूंगा। किसी का अहित करने की इच्छा रखनें वाले मेरी पोस्ट में रुचि न रखें।।(करबद्ध प्रार्थना) तंत्र विद्या की सिद्धि या इस विद्या का प्रयोजन अपनी आत्मा की रक्षा,देवताओं की प्रसन्नता,सज्जन व्यक्ति की रक्षा,अबोध का कष्ट निवारण,परोपकारीयों की रक्षा करना तंत्र शास्त्र का सदुपयोग एवं सिद्धि है। सबसे पहले तंत्र के अन्तर्गत में रोग निवारण बताता हूँ। प्रथम ज्वर निवारण एवं नकारात्मक ऊर्जा निवारण> ●लोहबान,गौघृत,हींग,देवदार,इन्द्रजौ,पीलीसरसों,बच,नीमपत्र,और मोरपंख इनको गौमूत्र से शुद्ध करके चूर्ण बनाकर धूप देने से ज्वर,ग्रहदोष,भूत,पिशाच,पूतना,शाकिनी,एकाहिक,द्वाहिक,त्र्याहिक,और चातुर्थिक ज्वर तथा अन्य प्रकार के दुःखदायी रोग तुरंत शान्त हो जातें है।। Astrolivepawan.blogsp...
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आज हम वर्ष कुंडली में लालील योग पर चर्चा करेंगे इस योग को वर्ष कुंडली में महत्वपूर्ण माना है!उनके अनुसार जिस वर्ष में पुरुष ग्रह चतुर्थ भाव में,दूसरे भाव में और लग्न में हो तथा क्रूर और पाप ग्रह छठे,आठवें,गयारहवें भाव में हो तो उस वर्ष कुंडली में लालील योग बनता है! फल >अनुभव से यह स्पष्ट होता है कि जिस वर्ष यह योग बनता है,वह वर्ष जातक के लिए अनुकूल रहता है तथा उस वर्ष जातक को आर्थिक दृष्टि से अच्छी अनुकूलता प्राप्त होती है!Astrolivepawan.blogspot.com, Gmail>Pawankhandal39@gmail.com ,Ph.8952825905,9462525905
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आज हम वर्ष कुंडली में बन रहे योगों में २ नं योग पर चर्चा करेंगे! २.काबिल योग >यदि वर्ष कुंडली के दूसरे भाव में चंद्रमा,बुध,गुरु,और शुक्र ये चारों ही ग्रह बैठे हों तथा तीसरे,छठे,नौवें,तथा बाहरवें (अपोक्लिम )में सूर्य,राहु,मंगल,और शनि जैसे पापग्रह हों,तो उस वर्षकुंडली में काबिल योग बनता है! >फल> यह योग वर्षफल विचार के अनुसार महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि धन स्थान में शुभग्रहों की युति तथा अपोक्लिम भाव में पाप ग्रहों का होना अनुकूल रहता है और इस प्रकार के ग्रह अनुकूल फल देने में सहायक होते है! जिस वर्ष काबिल योग बन रहा हो उस वर्ष जातक को विशेष धन प्राप्ति,सम्मान में वृद्धि,नौकरी में उन्नति और राज्य में मान सम्मान मिलता है आगर जातक राजनीती में रूचि रखता हो तो,उस वर्ष जातक चुनाव में अवश्य विजयी होता है! Astrolivepawan.blogspot.co...
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मृत संजीवनी मंत्र प्रयोग भारतीय ऋषि-मुनियों ने महामृत्युंजय तथा गायत्री मंत्र को मिलाकर एक अन्य मंत्र महामृत्युंजय गायत्री (मृत संजीवनी) मंत्र बनाया था, इस मंत्र से मुर्दा भी जिंदा हो जाता है हिंदू धर्म में दो मंत्रों महामृत्युंजय तथा गायत्री मंत्र की बड़ी भारी महिमा बताई गई हैं। कहा जाता है कि इन दोनों मंत्रों में किसी भी एक मंत्र का सवा लाख जाप करके जीवन की बड़ी से बड़ी इच्छा को पूरा किया जा सकता है चाहे वो दुनिया का सबसे अमीर आदमी बनने की इच्छा हो या अपना पूरा भाग्य ही बदलना हो। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि भारतीय ऋषि-मुनियों ने इन दोनों मंत्रों को मिलाकर एक अन्य मंत्र महामृत्युंजय गायत्री मंत्र अथवा मृत संजीवनी मंत्र का निर्माण किया था। इस मंत्र को संजीवनी विद्या के नाम से जाना जाता है। इस मंत्र के जाप से मुर्दा को भी जिंदा करना संभव है बशर्ते गुरू से इसका सही प्रयोग सीख लिया जाए। हालांकि भारतीय ऋषि-मुनि इस मंत्र के जाप के लिए स्पष्ट रूप से मना भी करते हैं। क्या है महामृत्युंजय गायत्री (संजीवनी) मंत्र ऊँ हौं जूं स: ऊँ भूर्भुव: स्व: ऊँ त्रयम्बकम यजामहे ऊँ तत्...
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(वर्षफल) ताजिक >वर्षफल अपने आप में एक श्रेष्ठ और अद्वित्यीय ज्योतिष साधन है,जिसके द्वारा हम प्रत्येक वर्ष प्रत्येक मास और प्रत्येक दिन का सूक्ष्म से सूक्ष्म भविष्य ज्ञात कर सकते है! >वर्षफल पद्धति ही ताजिक कहलाती है! इस पद्धति में एक एक वर्ष का अलग-अलग फल तथा प्रत्येक वर्ष में नवग्रहों के स्वतंत्र फल को महत्व दिया गया है,नवग्रहों को स्वीकार करते हुए भी उनमे एक एक ग्रह को सर्वाधिक महत्व दिया गया है, जिसे वर्षेश कहा जाता है! >निम्न पांच ग्रहो को वर्ष में प्रधानता दी और इसमें से जो सर्वाधिक बली हो,उसे वर्षेश माना !ये पांच ग्रह हैं -१ जन्मकुंडली के लग्न राशि का स्वामी! २ वर्षफल कुंडली के लगन राशि का स्वामी! ३ मुंथेश ! ४ त्रिराशिपति एवं ५ दिन में प्रवेश हो तो सुर्याधिष्ठित राशि का स्वामी एवं रात्रि में प्रवेश हो तो चन्द्राधिष्ठित राशि का स्वामी! इन पांचो ग्रहों में जो सर्वाधिक बली ग्रह हो,उसे वर्षेश कहते हैं!